Lokmanya Bal Gangadhar Tilak Biography In Hindi


Lokmanya Bal Gangadhar Tilak Biography In Hindi

Lokmanya Bal Gangadhar Tilak

Biography Of Bal Gangadhar Tilak In Hindi - बाल गंगाधर तिलक की जीवनी हिंदी में

यह लेख इसीलिए लिखा गया है की आज के हमारे देश की युवा पीढ़ी को हमारे देश के इतिहास,संस्कृति हमारे देश को आज़ाद करने के लिए अपनी जान की परवाह करे बिना अपने देश को अंग्रेजो की हुकूमत से आज़ादी दिलाने वाले महापुरुषों के जीवन के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो और उन्होंने किए हुवे काम सत्याग्रह आदि की जानकारी प्राप्त हो। उन महापुरुषों में से एक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी के जीवन (Lokmanya Bal Gangadhar Tilak Biography In Hindi) के बारे और उन्होंने आज़ादी के लिए दिया हुवा बलिदान के बारे में सम्पूर्ण जानकारी जानेगे।

लोकमान्य तिलक इनका नाम बाल गंगाधर तिलका था। इनका जन्म साल 28 जुलाई ,1856 में रत्नागिरी जिल्हे में चिखली इस गांव में हुवा। उनकी सम्पूर्ण पढ़ाई पुणे में ही हुई । आगे उन्होंने पुणे को ही अपनी कर्मभूमि चुनलिया। पढ़ाई चालू रहते उनकी पहचान आगरकर जी के साथ हुई। समान विचारो के इन दो दोस्तों ने भारत देश को अंग्रेजो से आज़ादी दिलाने का निश्च्य किया। इन दोनों महापुरुषों ने अपना आगे का जीवन भारतीय जनताके सेवा में समर्प्रित कर दिया था।

* Work Done In The Field of Education - शिक्षा के कार्य

गरीब जनता को पढ़ाई करते आये इस उदेश्य से लोकमान्य तिलक ,आगरकर ,और विष्णुशास्त्री चिपरूणकर इन्होने साल 1861 में पुणे यहाँ न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना की , इसके बाद साल 1864 में डेक्क्न एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की ,इस संस्था के जरिये फॉर्गुसन कॉलेज की सुरुवात हुई।

* Introduction of Current Paper - वर्तमानपत्र की सुरुवात

जनतामे सामाजिक और राजकीय वैचारिक जागृति जगाने की भावना से तिलक और आगरकर इन्होने साल 1881 में मराठा और केसरी ये दो सप्तिक वर्तमान पत्र सुरु किया। पहले राजकीय सुधारना या सामाजिक सुधारना इस प्रश्न पर तिलक और आगरकर इनके विचारो में मतभेद निर्माण होने की वजहसे अगरकरने 1888 में केसरी के सम्पादक पद से राजीनामा दिया। उनके बाद तिलक केसरी के सम्पादक हुवे केसरी के माध्यमसे तिलकजी ने ब्रिटिश शाशन के राज्यवेवस्था पर कठोर प्रहार किये।

* State work of Lokmanya Tilak - लोकमान्य तिलक के राजकीय कार्य

साल 1885 में स्थापन हुवे राष्ट्रिय कांग्रेस की स्थापना में तिलकजी का बड़ा हाथ था। साल 1905 में लार्ड कर्ज़न ने बंगाल के टुकड़े किये। कर्ज़न के किये टुकड़ो का आपन विज्ञापन और आंदोलन के माध्यम से निषेध करना ऐसा जहालमतवादी विचारो की हामी थी। ये बात मवालवादी नेताओ को स्वीकार नहीं थी। तिलकजी ने बंगालके टूड़को के विरुद्ध सम्पूर्ण जागृति निर्माण करने के लिए दौरे निकाले इस दौरे के माध्यमसे स्वदेशी ,स्वराज्य ,राष्ट्रिय शिक्षा और बहिष्कार इन चार तत्वों का भारत भर प्रचार किया।

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* Tilakji's First Imprisonment - तिलकजी की पहली कैद

साल 1897 में पुणे में प्लेगकी बीमारी आई थी। ब्रिटिश शाशन ने प्लेग निवारण करने के लिए रैड और ऍमहर्ट इन दो अधिकारियो की नियुक्ति की ,इन अधिकारियोंने प्लेग निवारण काम की आड़ में पुणे की जनतापर अत्यंत अत्याचार किया। लोकमान्य तिलकजी ने केसरी के माध्यम से इस प्रकरणपर कड़क लेख लिखा।

इस काल में चाफेकर बंधूने रैड की हत्या की। ब्रिटिश शाशन ने केसरीके लेखो का आधार लेके तिलकजी पर राजद्रोह का केश दर्ज किया। इस प्रकरणमे उन्हें देढ साल की सजा सुनाई गई। तिलकजी को हुई सजा का विरोध करने किलिये भारतीय जनताने एक दिन का खुद से कर्फु रखा। ये भारत का पहला कर्फु था।

साल 1908 में खुदीराम बोसने मुज्जप्फरपुर के मजिस्ट्रेट के गाड़ी पर बम फेका , इसके लिए खुदीराम बोस इन्हे फांसी की सजा हुई। लोकमान्य तिलक ने खुदीराम बोस की इस कृति पर केसरी के माध्यम से समर्थन किया और उसपर लेख लिखा।

केसरी के इस लेख का आधार लेके तिलक क्रांतिकारों को प्रोत्साहन देरहे है ऐसा ऐसा गुना शाशन उनपर लगाया। इस पर न्यायालय ने उन्हें छे साल की सजा सुनाई। इस बार उन्हें मंडाले की जेल में रखा गया था। मंडाले यहाँ की जेल में सजा भोगते वक़्त उन्होंने भगवत गीतपर 'गीतारहस्य ' इस नाम से अजोड़ टिका की।

* Home Rule League Satyagraha - होमरूल लीग सत्याग्रह

साल 1914 में तिलक मंडाले से सजा पूरी करके वापस आये। सजपुरी करके आने के बाद उन्हें मरहुवे राष्ट्रिय सत्याग्रह को फिर से जागृत करने के लिए एक नए आंदोलन की सुरुवात करने की जरूरत महसूस हुई।

इसलिए तिलकजीने अप्रैल 1916 में होमरूल लिक सत्याग्रह सुरु किया। इस सत्याग्रह के जरिये बेलगाओं में सभा भरी थी तब अपने अध्यक्ष पद से बोलतेहुवे 'स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और वो में लेकेहि रहुगा ऐसी घोषणा की। ये सत्याग्रह खंडित करने के उदेश्य से ब्रिटिश शाशन ने साल 1916 में लोकमान्य तिलकजी पर फिर राजद्रोह का गुन्हा दाखल किया। मगर इस गुन्हा से उन्हें वो निर्दोष साबित हुवे।

* Bibliography - ग्रंथसंपदा

लोकमान्य तिलक जी की शोध और पढ़ाई में बोहत जिज्ञासा थी। उन्होंने कहा था की अगर में स्वतंत्र Bharat में जन्महोता तो में गणित जैसी विषय में संशोधन करने में पूरी जिंदगी देदेता। राजकरण की गतिविधियों से समय निकल के उन्होंने अनेक संशोधन परं ग्रन्थ लिखे।

मंडल यहाँ की जेल में रहते वक़्त 'गीतारहस्य ' ये भगवतगीता पर आधारित टीकाग्रंथ लिखा। उन्होंने 'ओरायन ,दी आर्किटिक होम इन दी वेदाज ' ये वेदोपर आधारित शिक्षापूर्ण ग्रंथ लिखा। बंगाल के टुकड़ो के जरिये लाल ,बाल और पाल इन त्रिमूर्ति ने सामान्य जनता को स्वराज्य की आंदोलन में शामिल होने के लिए राजी किया।

उन्होंने ब्रिटिश सत्ताके खिलाफ भारतीय जनतामे तीव्र असंतोष की भावना निर्माण की। इसीलिए चिरोलने 'दी इंडियन अनरेस्ट ' इस ग्रन्थ में लोकमान्य तिलक इनका वर्णन 'भारतीय अशंतोष के जनक ' ऐसे शब्दों में किया है। ऐसे इस महान महापुरुष का 1 अगस्त 1920 में मुंबई में निधन हो गया।