Maharana Pratap Information In Hindi


Maharana Pratap Information In Hindi

Maharana Pratap Information In Hindi

Maharana Pratap Information In Hindi - महाराणा प्रताप की जानकारी हिंदी में

आज इस लेख में भारत के वीर पुत्र महान योद्धा महाराणा प्रताप सिंह (Maharana Pratap Singh) जिन्हे महाराणा प्रताप के नाम से भी जाना जाता है। जिन्होंने मुघलो के सामने अपना सिर कभी नहीं झुकाया ऐसे वीर योद्धा के जीवन के बारे में और उनके विचारो के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी जानेगे (Maharana Pratap Information In Hindi) चलीये जानते है महाराणा प्रताप जी का इतिहास (History Of Maharana Pratap)।

महाराणा प्रताप सिंह

महाराणा प्रताप सिंह इस महान राजपूत योद्धा को महाराणा प्रताप के नाम से भी जाना जाता है। भारत के वायवे दिशा के और के मेवाड़ राज्य के ये 13 वे राजा थे। अभी ये राज्य राजस्थान में समाया है। उन्हें मेवाड़ी राणा भी कहा जाता है। मोघल सम्राटोकि विस्तारणिति को हमेशा लश्करी दावपेंचोसे ध्वश्त करनेवाला शूरवीर की तौर पर पहचाने जाते है।

हिन्दू राजपूत परिवारमे उदयसिंघ दूसरे और महारानी जयवंतबाई इनके घर उनका जन्म 9 मई 1540 में हुवा था। मेवाड़ का कुंभलगढ़ ये उनका जन्म स्थान था। अभी ये किल्ला कुंभल फोर्ट के नाम से राजस्थान के राजसमंद जिल्हे में है। शक्ति सिंह ,विक्रम सिंह और जगमलसिंह ये महाराणा प्रताप के छोटे भाई थे। चाँद कवर और मन कवर वे दोनों सौतेली बहने भी थी।

उनका विवाह बिजोलियाके अजबदे पूवर इनके साथ हुवा था। इसके अलावा और 10 विवाह उन्होंने किये थे। उन्हें कुल 17 बच्चे थे अमरसिंघ उनमेसे एक था। 1572 में उदयसिंघ इनके मृत्युके बाद रानी धीरबाई इनका लड़का जगमल गद्दी पर बैठे ऐसी इच्छा दरबारी प्र्धानमंत्रियोने परम्पराके अनुसार बड़े लड़के तौरपर प्रतापसिंघ इनकिहि उदयसिंघ इनका उत्तराधिकारी के तौर पर चुना गया।

प्रतापसिंघ इन्होने महाराणा प्रताप के तौर पर राजपदकी सुत्रे अपने हातो पर ली। मेवाड़के सिसोदिया राजपूतोके वंशपरम्पराके वे वैसी 54 वे सत्ताधीश थे। ये सत्ता बद्दल जगमल को स्वीकारनहीं था तो इस घटना का बदला लेने के लिए अजमेर में अकबर के साथ जेक मिलगया। अकबरने उसे जहाजपुर के जहागिरी दी इ.स . 1567 से 1568 तक सालभर मोगलोंने मेवाड़ की पूर्वदिशा की और से कब्जा किया हुवा था। और जंगल और अरावली पर्वतो के प्रदेश महाराणा प्रताप सिंह के कब्जे में थे।

अकबरको मेवाड़से गुजरात की और जानेवाला रास्ता सुरक्षित करनाथा 1572 में महाराणा प्रताप सत्ता हात में लेते ही अकबरने उन्होंने भी और राजपूत राजकीतरह अकबरकी बात मनीचहिये इसलिए अनेक राजदूत भेजके आव्हान किया। पर महाराणा प्रताप ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरादिया। इसके बाद युद्ध तो होना ही था।

भारत के इतिहासका प्रशिद्ध हल्दीघाटी के युधोंको 18 जून 1576 में आखिर हळदीघाटीपासके गोगुंडा में युद्ध की सुरुवात हुई। अमर के मान सिंह (पहला ) इनके नेतृत्व में मोगलोंके सेना के साथ महाराणा के सैनिक भीड़ गए। यह मोगलो की जित हुई अनेक मेवाड़ी सेनिको की जान गई पर महाराणा प्रताप उनके हात नहीं लगे उन्होंने 3 हजार घोड़दौड़ और 400 भिल्ल धनुर्धारी और मोगलोंए 5 हजार से 10 हजार सैनिक उतारे थे। करीब छे घंटा ये भयंकर युद्ध चला।

खुद महाराणा प्रताप इस युद्ध में जख्मी हुवे दूसरे दिन फिर युद्धमे उतरने के लिए उन्होंने पर्वतराजित आश्रय लिया। महाराणा या उनके निकट के उदयपुर के परिवार को पकड़ नहीं पाने के कारण मोगलो के लिए ये जित वैसे ही फालतू ठहरी। अकबर के फौज वायव्वे दिशा के और निकल जानेके बाद ये सेनिको के साथ पर्वतराजियस बहार निकल के पश्चिमकी भगोपर उन्होंने फिर से जित हासिल की राजस्थान के इतिहास में 1582 के दीवाड़ युद्ध को भी बोहोत महत्व है क्युकी , इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह इन्होने हात से गया राज्य फिर से काबिज किया। ये भी युद्ध मोगलो के साथ बोहोत दिन चला। इसीलिए कर्नल जेम्स डॉट इन्होने इस युद्ध को मैराथन वॉर कहा है।

देवाड में महाराणा की फौज अचानक मोगलोंके सामने आनेसे मोगलो के बिच चेंगराचेगरी हुई। इसलिए वे जान बचने के लिए पहाड़ो के बिच से भाग रहे थे मोगलो ने उनका पीछा किया। और उन्हें दूसरी और दबोच लिया। बंगाल और पंजाब के दंगखोर और मिर्ज़ा हकिमके पंजाब के आक्रमणसे मेवाड़ का मोगलोंका दबाव 1579 में खत्म हुवा। महाराणा ने जल्दी ही 1582 में देवाड के मोगलोकि 36 छावनी अपने ताबे में ली।

इस पराभव के बाद अकबर ने मेवाड़ के और देखना बंद कर दिया। इसके बाद 1585 में अकबर लाहौर की और गया वहासे वो 12 साल यहाँ के हलचल पर नजर रखरहा था। इस मौके का फायदा लेके महाराणा ने पश्चिम मेवाड़के कुम्भलगढ़ ,उदयपुर ,गोगुंडा भाग अपने कब्जे में लिया। इस अंतराल में डूँगरपुरके पास चावड यहाँ नहीं राजधानी बनाई।

ऐसा कहाजाता है की ,चावड यहाँ शिकार पर जाते वक़्त हुवे हादसे के जख्मोके कारण 19 जनवरी 1597 में 56 वे साल में उनका अंत हुवा। मरते वक़्त अमरसिंघ को बतायाथा की कभी भी मोगलो के अधीन नहीं जाना और फिर चितोड़ जितने के विषम मत सोचना। उसकेबाद पुत्र अमर सिंह गद्दी पर आया।

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महाराणा के मृत्युके वक़्त लाहौर में था वहा उसे महाराणा के मृत्यु की बात पता चली उस्वक़्त अकबरका मंत्री दूसरा आधा इसने इस मरण पर अकबर के प्रिक्रिया का वर्णन किया है की ये गहलोत राणा प्रतापसिंघ उसके निधनपर इस सम्राटने दत्तोतले जिब चबाकर रोया। कारण ,भले तू राज्य गवाया पर हमारे समने क्या किसीके भी सामने झूका नहीं। तेरा गौरव दुनिया के सामने इतिहास में कायम रहेगा इसीलिए में ऐसा कहता चुकी तू हमेसा जीता और में हारा।

महाराणा प्रताप के नाम से आज अनेक स्थल है। उनके पराक्रम दिखाने वाले अनेको दूरदर्शन शो और मूवी है। गुरिल्ला युद्धनीतिकेलिए ये परिचित है वैसे ही वे एकमेव राजपूत है की उन्होंने पहाड़ो और जंगल में रहे मगर मुगलो के अधीन नहीं हुवे। इसीलिए उन्हें महान योद्धा के नाम से जाना जाता है।

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